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Saturday, June 29, 2019

'कभी-कभी अफेयर की खबरें सच भी होती हैं'

फिल्म 'स्टूडेंट ऑफ द इयर' से बॉलिवुड में दस्तक देने वाले ने अपने सात साल के करियर में सफलता और असफलता दोनों का स्वाद चख लिया। उनकी तीसरी ही फिल्म एक विलेन जहां ब्लॉकबस्टर रही, वहीं बीते सालों में 'बार बार देखो', 'अ जेंटलमैन', 'अय्यारी' जैसी फिल्में नहीं चलीं। हालांकि, सिद्धार्थ मानते हैं कि इस सफलता और असफलता दोनों से ही उन्होंने काफी सीखा। सफलता-असफलता दोनों ने सिखाया बॉलिवुड में अपने अब तक के सफरनामे पर सिद्धार्थ कहते हैं, 'इन सात सालों में मैंने बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे। बहुत कुछ सीखा। शुरू में आपमें एक अनअवेयरनेस होती है, वहां से फोकस्ड होने में समय लगता है और उस समय में आप बहुत कुछ सीखते हैं। मैंने अपनी पिछली तीन-चार फिल्मों से बहुत कुछ सीखा है। कोई फिल्म चलेगी या नहीं, यह रिलीज के पहले समझ पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए आपकी कोशिश होनी चाहिए कि एक ऐक्टर के तौर पर आप अपना काम अच्छे से करें, दर्शकों को कुछ अलग दें, ताकि फिल्म न भी चले, तो लोग कम से कम यह कहें कि इस लड़के ने कुछ अलग करने की कोशिश की। यह एक सीख रही। इसके अलावा यह भी एक सीख रही कि स्क्रिप्ट, बजट और बॉक्स ऑफिस के हिसाब से किसके साथ किस सुर की फिल्म करनी चाहिए, क्योंकि हर डायरेक्टर का अलग सुर होता है। इंशाअल्लाह, अगर इस साल सबकुछ अच्छा जाता है, तो मैं एक्चुअली खुश हूं कि मैं इस उतार-चढ़ाव से गुजरा, क्योंकि जब आप अपनी तीसरी ही फिल्म में इतनी सक्सेस पा जाते हैं, जैसा 'एक विलेन' के साथ हुआ, तो आप उस सक्सेस को भी भांप नहीं पाते। तब मैं उतना अवेयर नहीं था, क्योंकि मेरा इंडस्ट्री से कोई क्लोज कनेक्शन नहीं था।' कॉम्पटिटिव न होता, तो दिल्ली में बैठा होता सिद्धार्थ की पहली फिल्म 'स्टूडेंट ऑफ द इयर' कॉम्पिटिशन पर बेस्ड थी, जिससे आलिया भट्ट और वरुण धवन ने भी डेब्यू किया था। क्या कभी ऐसा लगता है कि बाकी दोनों स्टूडेंट उनसे आगे निकल गए? सिद्धार्थ रियल लाइफ में खुद को कितना कॉम्पटिटिव मानते हैं? यह पूछने पर उनका कहना है, 'बिलकुल वे बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। रही बात मेरे कॉम्पटिटिव होने की, तो हम लोग, जो बाहर से आते हैं, वे पहले दिन से ही सैकड़ों लोगों के साथ ऑडिशन देते हैं और अगर वहां से यहां तक पहुंचे हैं, तो यह अच्छा करने की चाहत ही है। वरना, मैं यहां बांद्रा के पाली हिल में नहीं होता, अपने शहर दिल्ली में ही कुछ कर रहा होता। इसलिए मुझमें कॉम्पटिटिवनेस तो है ही। कभी-कभी लोग कॉम्पिटिशन को नेगेटिव तौर पर लेते हैं, लेकिन आप अगर इसे अच्छा काम करने, फोकस्ड रहने, महत्वाकांक्षी होने के नजरिए में लें, तो यह मुझमें सौ गुना से भी ज्यादा है। अगर मुझमें यह न होता, तो अपने शहर, अपने फैमिली प्रफेशन को छोड़कर यहां नहीं पहुंच पाता, क्योंकि यहां शुरू से ही काफी निराशा झेलनी पड़ती है। जब आप अपना पहला ऑडिशन देते हैं और सिलेक्ट नहीं होते हैं, वहीं से कहानी शुरू हो जाती है कि रिजेक्शन को एक्सेप्ट करना है और आगे बढ़ना है, तो कॉम्पटिटिव तो मैं बहुत हूं, जो जरूरी भी है।' सच्चे हीरोज पर फिल्में बननी चाहिए सिद्धार्थ अपनी पहली बायॉपिक फिल्म के रूप में कारगिल शहीद मेजर विक्रम बत्रा की जिंदगी को परदे पर उतारने जा रहे हैं। देखा जाए, तो इन दिनों इंडस्ट्री में देशभक्ति वाली फिल्मों का ट्रेंड सा चल रहा है। लेकिन सिद्धार्थ इसे सक्सेस का फॉर्म्युला नहीं मानते। बकौल सिद्धार्थ, 'अगर मैं 'शेरशाह' की बात करूं, तो मेरे लिए यह बिना आर्मी, बिना इंडिया या पाकिस्तान का जिक्र या किसी और देश को हराने या जिंगोइजम के बगैर भी एक बहुत प्रेरक और भावनात्मक कहानी है। हालांकि, विक्रम बत्रा ने देश के लिए जान दी है, इसलिए हम इस साइड को नकार नहीं सकते। लेकिन मुझे वह एक कैरेक्टर के तौर पर बहुत दिलचस्प लगे। उनकी लव स्टोरी बहुत दिलचस्प रही है। उनकी गर्लफ्रेंड अब भी उन्हें उतने ही प्यार से याद करती हैं। रही ट्रेंड की बात, तो सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्में बनाना एक क्रिएटिव पर्सन के तौर पर हमारा अधिकार है। मुझे नहीं लगता कि यह एक बॉलिवुड फॉर्म्युला है। आप सच्ची कहानी दर्शा रहे हैं। ये जवान या खिलाड़ी, जैसे मिल्खा सिंह पर फिल्म बनी थी, ये हमारे सच्चे हीरोज हैं। ऐसे किरदारों पर हर देश, हर कल्चर में फिल्में बनाई जाती हैं, ताकि वे बच्चों को इंस्पायर कर सकें।' अफेयर की खबरों से फर्क नहीं पड़ता प्रफेशनल लाइफ के अलावा सिद्धार्थ के लिंक अप की खबरें भी अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। उनका नाम कभी को-स्टार तारा सुतारिया, तो कभी कियारा आडवानी के साथ जोड़ा जाता है। ऐसे में क्या ये खबरें उन्हें परेशान करती हैं? इस पर वह कहते हैं, 'अब नहीं। बिलकुल नहीं। शुरुआत में, जब मैं दिल्ली से आया था, तो मुझे इतनी जानकारी नहीं थी कि ऐसी भी चीजें लिखी जाती हैं, जो न भी सच हों। कभी-कभी ये बातें सच भी होती हैं। ऐसे रिलेशनशिप हम सबके हुए हैं। लेकिन कुछ समय के बाद एक मच्योरिटी आती है, आप समझ जाते हैं कि यह खबर कहां से आई है और कैसे लोग सोच रहे हैं, तो आपको ये चीजें परेशान नहीं करती हैं।' घर का है पुराना फिल्मी कनेक्शन पिछले दिनों सिद्धार्थ के बैचलर पैड की भी काफी चर्चा रही, जिसे गौरी खान ने डिजाइन किया है। सिद्धार्थ बताते हैं, 'इस जगह का फिल्मी इतिहास रहा है। यहां देव आनंद साहब का पुराना स्टूडियो हुआ करता था। अभी भी नीचे उनकी मूर्ति लगी हुई है, तो मैं लकी हूं कि ऐसी जगह पर रह रहा हूं। इसे डिजाइन करने में गौरी खान जी ने मेरी मदद की है। दरअसल, मुझे घर स्टाइलिश, लेकिन एक वार्म फीलिंग वाला चाहिए था, जिसमें जमीन से जुड़े होने का अहसास हो। वह हमेशा कहती थीं कि आप कुछ वैसा चाहते हैं, जैसा आर्यन को पसंद है। कुछ सेक्शन को लेकर वह कहती थीं कि शाहरुख भी इसे पसंद करते। बाहर जो झूला है, वह शाहरुख सर ने अपने फार्म के लिए खरीदा था। यह उनकी स्वीटनेस है कि उन्होंने वह मुझे दे दिया। मेरे लिए यह काफी मजेदार रहा, क्योंकि मैं खुद पिछले दस-बारह सालों में मुंबई में बहुत सारे घर में रह चुका हूं, छोटे से लेकर बड़े तक में, टचवुड अभी तक यह बेहतर ही हुआ है और इंशाअल्लाह आगे और बेहतर ही होगा।'


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